राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, उदयपुर धर्म परिवर्तन मामले में सिंडिकेट के आरोपियों की जमानत खारिज, कोर्ट ने कहा- ‘गंभीर मामला, जांच जारी’
हाईकोर्ट की दोटूक: न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल की एकल पीठ ने याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि आरोपियों की संलिप्तता प्रथम दृष्टया साबित हो रही है।
अंकुर नरूला कनेक्शन: दुर्ग (छत्तीसगढ़) के अमित कुमार और उदयपुर के हरीश के बीच अंकुर नरूला से धर्मांतरण बिल के विरोध और वित्तीय लेनदेन के मैसेज मिले।
ऋषभदेव में धर्म परिवर्तन कैंप: उदयपुर के ऋषभदेव में टेंट लगाकर और जमीन की व्यवस्था कर कैंप आयोजित करने का आरोप।
चालान के बाद छूट: अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा चालान (चार्जशीट) दाखिल करने के बाद ही आरोपी नई जमानत याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र होंगे।

क्या है पूरा मामला?
राजस्थान के उदयपुर जिले के ऋषभदेव क्षेत्र में कथित तौर पर धर्म परिवर्तन (धर्मांतरण) गतिविधियों को बढ़ावा देने और कैंप आयोजित करने के मामले में गिरफ्तार आरोपियों की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट में जमानत अर्जी ([CRLMB-9344/2026]) दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल की अदालत ने मामले की गंभीरता और पुलिस केस डायरी का अवलोकन करने के बाद सभी आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी – ‘सबूतों से हो सकती है छेड़छाड़’
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने केस डायरी का गहनता से अध्ययन किया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि:
”जांच अभी प्रारंभिक और महत्वपूर्ण चरण में है तथा कुछ अन्य आरोपी अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। ऐसे में संगठित सिंडिकेट (Organized Syndicate) के रूप में काम कर रहे इन आरोपियों को जमानत पर रिहा करने से जांच प्रभावित हो सकती है और वे साक्ष्यों/सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं।”
अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए इस चरण पर जमानत देने से साफ इनकार कर दिया।
केस डायरी से खुलासा – आरोपियों की भूमिका (Role of Accused in Syndicate)
पुलिस जांच और केस डायरी के आधार पर हाईकोर्ट के आदेश में सभी आरोपियों की अलग-अलग भूमिका का उल्लेख किया गया है:
अमित कुमार (दुर्ग, छत्तीसगढ़): ‘अनुग्रह ज्योति संस्थान’ नामक संस्था का मालिक है, जो धार्मिक गतिविधियों के प्रचार-प्रसार में शामिल है। यह छत्तीसगढ़ से पलाश और आशीष के साथ उदयपुर आया था। केस डायरी के अनुसार, इसके मोबाइल से अंकुर नरूला के साथ ‘धर्मांतरण बिल’ के विरोध पर चर्चा और भारी वित्तीय लेनदेन के सबूत मिले हैं।
हरीश (उदयपुर): उदयपुर की ‘अपम एंड शालोमी वेलफेयर सोसाइटी’ का संचालन करता है। इसने राजस्थान में धार्मिक गतिविधियों और धर्मांतरण की सूचनाएं अंकुर नरूला के साथ साझा कीं। दोनों के बीच लगातार पैसे का लेन-देन (Monetary Transactions) भी हुआ है।
पलाश और आशीष: ये अमित कुमार की संस्था का कामकाज संभालते हैं और दुर्ग से उदयपुर के ऋषभदेव कैंप में साथ आए थे।
बाबूलाल: इसने ऋषभदेव में कैंप आयोजित करने के लिए जमीन की व्यवस्था की थी। इसके घर से धार्मिक पुस्तकें बरामद हुई हैं।
प्रभुलाल (हरीश का ससुर): इसने कैंप के लिए टेंट और बुनियादी व्यवस्थाएं जुटाने में मदद की।
भेरूलाल व सोहन: भेरूलाल (प्रभुलाल का बेटा) और सोहन (बाबूलाल का चचेरा भाई) ने कैंप संचालन और टेंट लगाने का काम संभाला।
शंकर, राकेश, अनिल, नारायण और दिनेश: ये सभी बाबूलाल के जरिए हरीश से जुड़े और ऋषभदेव में धर्मांतरण कैंप के आयोजन में सक्रिय सहयोग दिया।
‘अंकुर नरूला’ और फंडिंग का नेटवर्क
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू अंतरराज्यीय नेटवर्क और फंडिंग का सामने आया है। केस डायरी के अनुसार, छत्तीसगढ़ के अमित कुमार और राजस्थान के हरीश, दोनों मुख्य आरोपी ‘अंकुर नरूला’ नामक व्यक्ति के संपर्क में थे।
इनके बीच धार्मिक परिवर्तन बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने और धर्मांतरण की गतिविधियों को बढ़ाने को लेकर टेक्स्ट मैसेज के जरिए बातचीत हुई थी। इसके अलावा, संस्थाओं और व्यक्तिगत खातों के बीच हुए संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की भी विस्तृत जांच पुलिस द्वारा की जा रही है।
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न्यायालय का अंतिम आदेश – चालान पेश होने तक राहत नहीं
न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल ने मामले की गंभीरता, आरोपियों की प्रथम दृष्टया संलिप्तता और लंबित जांच को देखते हुए आदेश जारी किया:
”तथ्यों और परिस्थितियों के कुल योग पर विचार करते हुए यह न्यायालय इस चरण में याचिकाकर्ताओं को जमानत देने का इच्छुक नहीं है। तदनुसार, ये जमानत याचिकाएं खारिज की जाती हैं। हालांकि, याचिकाकर्ता पुलिस द्वारा चालान (आरोप पत्र) पेश किए जाने के बाद नई जमानत याचिकाएं दायर करने के लिए स्वतंत्र होंगे।”
निष्कर्ष
उदयपुर के ऋषभदेव धर्मांतरण मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि संगठित तरीके से चलाए जा रहे कथित धर्म परिवर्तन सिंडिकेट पर कानून का शिकंजा कसता जा रहा है। पुलिस द्वारा चालान दाखिल किए जाने तक आरोपियों को जेल में ही रहना होगा।
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